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हर क्षण को गीत किया / श्रीकान्त जोशी

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हर क्षण को गीत किया
सुनते हो मीत पिया!

यादें मुँहज़ोर सखी
बनकर जब छेड़े थीं
सूरज को रोक रहीं
बादल की मेड़ें थीं
अपने में बँध-बँध कर
अनमन ही सध-सध कर
मैंने सौ बार तुम्हें
हेरा और टेर लिया।

दिन बौराया मन
रातों ने सपनों की
जब-जब आ बात कही
पलकों ने अपनों की
नींदों से उकता कर
सरहाने कुछ गाकर
काजल के आँसू की
माला को बोर लिया।

हौले से रात गई
तेज़-तेज़ उमर नई
मुट्ठी में बालू-सी
कब थी, कब रीत गई
कैसी अनरीत हुई
वंशी में गीत नहीं
अब है जो बीत रहा
तब जो था बीत लिया।