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हर सम्त सुकूत बोलता है / परवीन फ़ना सय्यद

हर सम्त सुकूत बोलता है
ये कौन से जुर्म की सज़ा है

हैं पाँव लहू-लुहान लेकिन
मंज़िल का पता तो मिल गया है

अब लाए हो मुज़्दा-ए-बहाराँ
जब फूल का रंग उड़ चुका है

ज़ख़्मों के दिए की लौ मैं रक्साँ
अर्बाब-ए-जुनूँ का रत-जगा है

अब तेरे सिवा किसे पुकारूँ
तू मेरे वजूद की सदा है