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हलोर / कुमार वीरेन्द्र

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जब मैं उससे
कहता, घोड़े पर चढ़ना है, तो
पीठ पर बैठा लेती, जब कहता, देखो तुम गाय हो न, मैं
बाछा हूँ न, भूख लगी है, दूध पिलाओ, तो अपनी छाती
धरा देती, भले उसमें दूध की एको बूँद नहीं
जब कहता, अरे भाई, बूँट
बोना है, चलो

बैल बनो, खेत जोतना
है कि नहीं, और वह बैल बन जाती, गर्दन में लपेटे
अपना आँचर पकड़ा देती, और मैं चल हट, हट-हट चल बैला चल, करते जहाँ
होती वहीं घुमाता, कि एक बार जाने का सुना तो सूझा, घोड़ा, गाय, बैल घास
खाते हैं, तो कुछ दूबें दुआर नीचे खेत से उखाड़ लाया, और कहा, देखो
छोटे बाबूजी कहते हैं, घास खाने से घोड़ा खूबे दौड़ता
है, गाय खूबे दूध देती है, अउर बैल न
हाली-हाली खेत जोतता है

ई लो, खाओ तो, उसने कहा
वह भात-रोटी खानेवाली गाय, घोड़ा, बैल है, मैंने कहा, ऊ तो
ठीक है चलो भात-रोटी भी खाना, ई भी खाओ, उसने फिर समझाया, बार-बार कहने पर बार-बार
समझाया, और जब देखा कोई आएगा, और पीटेगा इस ज़िद पर, तो एक दूब मुँह में डाल चबाने
लगी, मैं देख-देख ख़ुश होने लगा, फिर कहा, अरे घास ही खिलाएगा कि पानी भी लाएगा
पानी लेकर आया और देखा, तो एक दूब भी कहीं नहीं, ख़ूब ख़ुश हुआ, सब
खा गई, ऐसा ही कई बार करता, और वह पानी लाने
भेज देती, लेकिन एक दिन

जब वह अपने घर में
नहीं थी, जाने का तो ढूँढ़ते, ढेंके के हौदे में झाँका तो
देखा, दूबें पड़ी हुई है, सुखा गई हैं, समझ गया, आजी बुड़बक बनाती है, ऐसे तो
दुबरी हो जाएगी, इसलिए एक दिन दूबों के साथ पानी भी लेते गया, अब आजी
का करती, कुछुओ लाने को भेजती जाता नहीं, फेर में पड़ गई, उसने फिर
कहा, वह भात-रोटी खानेवाली गाय, घोड़ा, बैल है, मैं भी वही
कहता रहा, ऊ भी खाओ, ई भी खाओ नाहीं
तो दुबर हो मर जाओगी

पता नहीं, आजी
ने इस ज़िद पर, बाबूजी से कहीं पिट
न जाऊँ, यह सोच कि क्या, एक-दो दूबें चबा, पानी से निगल
गई, जानता हूँ मैं, ऐसी ज़िद पर तो माई से भी, जो बच्चों पर
जल्दी हाथ नहीं उठाती थी, पिट जाता, यह आजी
ही थी, जो न मार सकती थी, न मारने
दे सकती थी, भले ही

घास खा सकती थी !