Last modified on 8 सितम्बर 2013, at 07:40

हवा-ए-तुंद के आगे धुआँ ठहरता नहीं / नामी अंसारी

हवा-ए-तुंद के आगे धुआँ ठहरता नहीं
हमारे सर पे कभी आसमाँ ठहरता नहीं

हिसाब-ए-दर्द करूँ भी तो इस से क्या हासिल
निगाह-ए-शौक़ में हर्फ़-ए-जियाँ ठहरता नहीं

न रास्ते का उन्हें इल्म है न मंज़िल का
हज़ार गर्द उड़े कारवाँ ठहरता नहीं

जहाँ पे सिक्का-ए-ज़र की खनक सुनाई न दे
फ़की़ह-ए-शहर घड़ी भर वहाँ ठहरता नहीं

क़रीब ओ दूर ये अफ़्वाह कैसी फैल गई
किसी के घर में कोई मीहमाँ ठहरता नहीं

हवा-ए-सज्दा ने हर आस्ताँ को देख लिया
जबीन-ए-शौक़ पे कोई निशाँ ठहरता नहीं

हम अपने आप की पहचान क्या करें ‘नामी’
यक़ीं पनपता नहीं है गुमाँ ठहरता नहीं