भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

हिज़्र ओ-विसाल / ब्रजेन्द्र 'सागर'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

फ़ज़ाओं को फिर वजह सी मिल गयी महकने की
अफसुर्दा[1]बादलों में से चाँद फिर मुस्काराया है
तख़्लीक़[2]में मेरी फिर आने लगे हैं शोखियों के दम
लबों पे फिर कोई मस्त नगमा उभर आया है

फिर से गाता है मल्हार साज़े जीस्त मेरा
फिर से छाई है तख्य्युल पे आरज़ुओं की घटा
झूमती बल खाती है बर्क उम्मीदों की
फिर से वफ़ा के ज़र्द आरीज़ों[3]में नूर बहा

मेरी तन्हाई भी सोई है आज उमरों के बाद
मैं खुद से भी मिला हूँ बाद मुद्दत के
दर्द की आँखों में भी है आज मर्सरत[4]के आँसू
तमन्ना को मिले फिर से पैरहन[5]हक़ीकत के

शब्दार्थ
  1. उदास
  2. रचनाएँ
  3. गाल
  4. खुशी
  5. लिबास