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हिन्दी साहित्य का इतिहास / राजुल मेहरोत्रा

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Rajul mehrotraroundcorner.pngहिन्दी काव्य का इतिहास नामक लेखों की इस शृंखला के लेखक राजुल मेहरोत्रा हैं। उन्होनें यह शृंखला कविता कोश के लिए विशेष-रूप से तैयार की है।
© राजुल मेहरोत्रा
सम्पर्क सूत्र: kavitakosh@gmail.com

हिन्दी साहित्य का इतिहास

हिन्दी साहित्य की रचना विदेशी आक्रमणोँ, युद्धों तथा गुलामी की परिस्थितियों मेँ हुई। मौखिक परम्परा मेँ जो कुछ सामग्री शेष रही, वह भी बहुत तथा भाषा की दृष्टि से इतनी बदल गयी कि उसका मूल रूप ही समाप्त हो गया। इस काल मेँ हिन्दी साहित्य मुख्यत: तीन क्षेत्रोँ से सम्बन्धित रहा है - राज्य, धर्म और लोक। राजदरबार में हिन्दी से सम्बन्धित सामग्री प्राप्त तो होती है किन्तु रचनाओँ मेँ क्षेपकोँ के बाहुल्य के कारण वीरगाथात्मक रासो ग्रन्थों की प्रामाणिकता समाप्त हो गयी है। धर्म के क्षेत्र में अध्यात्म, भक्ति सम्बन्धी अनेक रचनाएँ प्राप्त होती हैँ, ये अपेक्षाकृत अधिक प्रामाणिक हैँ। साहित्य प्रेमियोँ ने बहुत सी हस्तलिखित रचनाओँ को सुरक्षित रखा है तथा बहुत सा साहित्य मौखिक परम्परा में सुरक्षित रखा है।

हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित सामग्री का सँचयन सर्वप्रथम विलियम जोन्स [१७८४ ई.] द्वारा स्थापित बँगाल की एशियाटिक सोसाइटी ने किया। इसके द्वारा लगभग ६०० संस्कृत तथा हिन्दी ग्रन्थोँ का पता लगाया गया। सोसाइटी की तरफ से डा० ए० टेसिटरी ने खोज कार्य किया, उन्होनेँ ’छन्द रावजयसती’ तथा ’कृष्ण-रुक्मिणी बेलि’ का संपादन भी किया। पश्चात वाराणसी मेँ १८९३ ई. मेँ नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। इस संस्था की सूचनाओँ से इतिहास-रचना के लिये अपरिमित सामग्री उपलब्ध हुई। इस सँस्था से जुड़कर डा० श्यामसुन्दरदास, श्याम बिहारी मिश्र, पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, हीरालाल जैन, प० विश्वनाथप्रसाद मिश्र आदि विद्वानों ने खोज कार्य किया।

उन्नीसवीँ शती से पूर्व विभिन्न कवियोँ और लेखकोँ द्वारा अनेक ऎसे ग्रन्थोँ की रचना हो चुकी थी जिनमेँ हिन्दी के विभिन्न कवियोँ के जीवन-वृत्त एवँ कृतित्व का परिचय दिया गया है जैसे- कालिदास कृत "हजारा’[१७१८], बलदेवकृत ’सत्कविगिरा विलास"[१७४६], सुब्बासिँह कृत ’विद्वन्मोदतरँगिणी’[१८१७], कृष्णान्न्द व्यासदेव कृत "रागसागरोद्भव" और "रागकल्पद्रुम"[१८४३], सरदारकवि कृत "श्रंगार संग्रह"[१८४८], भारतेन्दु कृत "सुन्दरी तिलक"[१८६९] आदि -- किन्तु इनमेँ काल-क्रम, सन-सम्वत आदि का अभाव होने के कारण इन्हें इतिहास की सँज्ञा नहीँ दी जा सकती।

वस्तुत: हिन्दी-साहित्य के इतिहास-लेखन का पहला प्रयास एक फ्रेँच विद्वान "गार्सां द तासी" ने किया। जिन्होँने फ्रेँच भाषा मेँ "हस्त्वार द ला लितरेत्युर ऎन्दुई ऎन्दुस्तानी" ग्रन्थ लिखा। इस ग्रन्थ में हिन्दी और उर्दू के ज्ञात कवियोँ का विवरण अकारादि क्रम से दिया गया है। इसका प्रथम भाग १८३९ ई. में तथा द्वितीय भाग १८४७ ई. में प्रकाशित हुआ, फिर १८७१ ई. में इसका संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ। तासी की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए शिव सिंह सेँगर ने १८८३ ई. मेँ "शिव सिँह सरोज" की रचना की। इस ग्रन्थ में लगभग १००० कवियोँ कवियोँ का जीवन-चरित्र एवँ उनकी कृतियोँ के नमूने प्रस्तुत किये गये हैँ।

सन १८८८ में एशियाटिक सोसायटी आफ़ बँगाल की पत्रिका के विशेषाँक के रूप में जार्ज ग्रियर्सन द्वारा रचित "द माडर्न वर्नेक्युलर लिटरेचर आफ़ हिन्दुस्तान" का प्रकाशन हुआ, जो नाम से इतिहास न होते हुए भी हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास कहा जा सकता है। इसमेँ लेखक ने कवियोँ और लेखकोँ का कालक्रमानुसार वर्गीकरण करते हुए उनकी प्रवृत्तियों को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इतिहास मेँ कवियोँ को अँक देने वाली प्रणाली ग्रियर्सन की देन है। सोलहवीँ-सत्रहवीँ शताब्दी के काव्य को "स्वर्ण-युग" की संज्ञा देने वाले ग्रियर्सन ही हैँ। सामग्री को यथासम्भव कालक्रमानुसार प्रस्तुत करना, प्रत्येक काल के शेष कवियोँ का अध्यायविशेष के अन्त में उल्लेख करना, सम्बन्धित साँस्कृतिक परिस्थितियों और प्रेरणा-स्रोतोँ का उदघाटन करना, हिन्दी साहित्य के विकास-क्रम का निर्धारण - चारण-काव्य, धार्मिक-काव्य, प्रेम-काव्य और दरबारी-काव्य के रूप में करना - आदि ग्रियर्सन की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैँ।

हिन्दी-साहित्येतिहास की परम्परा में मिश्रबन्धुओँ द्वारा रचित "मिश्रबन्धु विनोद" उल्लेख्नीय है। यह चार भागोँ मेँ विभक्त है। प्रथम तीन भाग १९१३ ई. मेँ प्रकाशित हुए तथा चतुर्थ भाग १९३४ ई. में प्रकाशित हुआ। इसमेँ लगभग पांच हजार कवियों को स्थान दिया गया है और इसे आठ से भी अधिक कालखण्डों में विभाजित किया गया है। इतिहास के रूप मेँ इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि इसमेँ कवियों के विवरणोँ के साथ-साथ साहित्य के विविध अँगोँ पर प्रकाश डाला गया है। कवियोँ की जीवनी तथा आलोचनाओँ के विवरण संग्रहीत किये गये हैँ। कवियोँ का सापेक्षिक महत्व निर्धारित करने के लिये उनकी श्रेणियाँ भी बनाई गयीँ हैँ। काव्य समीक्षा के क्षेत्र में परम्परागत पद्धति ही ग्रहीत हुई है। अधिकाँश परवर्ती इतिहासकारोँ ने इस इतिहास-ग्रन्थ का आश्रय ग्रहण किया है।

सन १९२९ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का प्रथम व्यवस्थित इतिहास-ग्रन्थ "हिन्दी साहित्य का इतिहास" लिखा, जो मूलत: काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित "हिन्दी- शब्द-सागर" की भूमिका में लिखा गया था, जिसे बाद मेँ पुस्तक का रूप दिया गया। इसके प्रारम्भ मेँ आचार्य शुक्ल ने लिखा -- " जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का सँचित प्रतिविम्ब होता है तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अन्त तक इन्हीँ चित्तवृत्तियोँ की परम्परा को परखते हुए साहित्य-परम्परा के साथ उनका सामँजस्य दिखाना ही "साहित्य का इतिहास" कहलाता है। जनता की चित्तवृत्ति बहुत-कुछ राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है।"

आचार्य शुक्ल ने हिन्दी का आविर्भाव काल सातवीँ शताब्दी से मानते हुए भी हिन्दी साहित्य का आरम्भ विक्रमी सँ० १०५० से माना तथा सम्पूर्ण हिन्दी साहित्येतिहास को चार काल-खण्डोँ मेँ विभक्त किया। प्रत्येक काल का नामकरण उसकी प्रमुख प्रवृत्ति के आधार पर ही किया। आचार्य शुक्ल ने कवियोँ और साहित्यकारोँ के जीवन-चरित सम्बन्धी इतिवृत्त के स्थान पर उनकी रचनाओँ के साहित्यिक मूल्याँकन को प्रमुखता दी है। इस क्षेत्र मेँ उन्होँने चुने हुए कवियोँ को ही लिया है और उनके विवेचन मेँ उनकी साहित्यिक महत्ता व लघुता का ध्यान रखते हुए उन्हेँ तदनुसार ही स्थान दिया है। आचार्य द्वारा इतिहास की रचना उस समय हुई थी जबकि हिन्दी का अधिकाँश प्राचीन साहित्य अज्ञात, लुप्त एवँ अप्रकाशित अवस्था मेँ पड़ा हुआ था, उसका प्रामाणिक अध्यन-विश्लेषण नहीँ हो पाया था। उस युग की सीमित सामग्री को जो रूप उन्होँने विवेचनात्मक तौर पर दिया है, वह निश्चय ही उनकी स्वतँत्र चेतना एवँ विवेचना शक्ति का परिचायक है। उनका रसवादी सिद्धाँत लोकमँगल भावना की कसौटी, काव्य मेँ मानव-समाज का प्रतिविम्ब तथा साहित्यिक धारा को विकसित करने वाली शक्तियोँ का विश्लेषण आदि काव्य, कवि तथा युग के उत्कर्ष के निर्धारण के आधार रूप मेँ गृहीत हुए हैँ। विभिन्न काव्यधाराओँ और युगोँ की साहित्यिक प्रवृत्तियोँ के निर्धारण मेँ उन्हेँ सफलता प्राप्त हुई है। उन्होँने भक्ति काल को चार भागोँ मेँ बाँटा है - पहले निर्गुण-धारा और सगुण-धारा मेँ फिर प्रत्येक को दो-दो शाखाओँ - ज्ञानाश्रयी शाखा व प्रेमाश्रयी शाखा तथा रामभक्तिशाखा व कृष्णभक्तिशाखा मेँ। रीतिग्रन्थकारोँ के आचार्यत्व एवँ कवित्व का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए उनकी उपलब्धियोँ तथा सीमाओँ के सम्बन्ध मेँ जो निर्णय आचार्य शुक्ल ने दिये, वे बहुत कुछ अँशोँ मेँ आज भी मान्य हैँ। भक्तिकाल की ही भाँति रीतिकाल मेँ भी नामकरण, सीमा-निर्धारण, परम्पराओँ व काव्यधाराओँ का वर्गीकरण वर्गविशेष के एकपक्षीय बोध का सूचक है जिससे इस काल के रीतिमुक्त प्रेममार्गी कवियोँ, वीररसात्मक काव्योँ के रचयिताओँ तथा राजनीति एवँ वैराग्य सम्बन्धी मुक्तकोँ के रचयिता कवियोँ के साथ न्याय नहीँ हो पाता। उन्होँने साहित्यिक परम्पराओँ और प्रवृत्तियोँ को युगविशेष की चित्तवृत्ति के प्रतिविम्ब के रूप में ही ग्रहण किया, उन तत्त्वोँ और स्रोतोँ की उपेक्षा की जिनका सम्बन्ध पूर्व प्रम्परा से है। परिणाम यह हुआ कि उन्होँने पूरे मध्यकाल की विभिन्न धाराओँ और प्रवृत्तियोँ को तदयुगीन मुस्लिम प्रभाव की देन के रूप मेँ स्वीकार कर लिया - जैसे भक्ति-आँदोलन तदयुगीन निराशा की देन है, सँत-मत इस्लाम के एकेश्वरवाद के प्रभाव का सूचक है, प्रेमाख्यान-परम्परा सूफी मसनवियों से अनुकृत है, आदि। वस्तुत: सँस्कृत साहित्य की पौराणिक परम्पराओँ, प्राकृत-अपभ्रँश के प्रेमाख्यानोँ व मुक्तकोँ की धाराओँ, सिद्धोँ व नाथपँथियोँ की गुह्य वाणियोँ की उपेक्षा करके मध्यकालीन हिन्दी-काव्य की विभिन्न काव्यधाराओँ के वर्तमान स्वरूप की आलोचना भले की जा सके, किन्तु उसके आधार-स्रोतोँ का अनुसन्धान और उनके विकास-क्रम की ऎतिहासिक व्याख्या सम्भव नहीँ है।

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने अपने ग्रन्थ "हिन्दी भाषा और उसके साहित्य का इतिहास" मेँ भाषा और साहित्य का आलोचनापरक विकास प्रदर्शित किया है। उन्होँने स्वदेशी साहित्य की महिमा का गुणगान किया है।

आचार्य शुक्ल के लगभग एक दशाब्दी बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने "हिन्दी साहित्य की भूमिका" प्रस्तुत की। इसमेँ आचार्य द्विवेदी ने परम्परा का महत्व स्थापित करते हुए उन धारणाओँ का खण्डन किया, जो युगीन प्रभाव के एकाँगी दृष्टिकोण पर आधारित थीँ। "हिन्दी साहित्य की भूमिका" के अनन्तर आचार्य द्विवेदी की "हिन्दी साहित्य: उदभव और विकास", "हिन्दी साहित्य का आदिकाल" आदि इतिहास सम्बन्धी रचनाएँ प्रकाशित हुईँ। हिन्दी साहित्य के इतिहास को विशेषत: मध्यकालीन काव्य के स्रोतोँ व पूर्व परम्पराओँ के अनुसँधान तथा उनकी अधिक सहानुभूतिपूर्ण व यथातथ्य व्याख्या करने की दृष्टि से आचार्य द्विवेदी का योगदान अप्रतिम है। आचार्य शुक्ल की अनेक धारणाओँ और स्थापनाओँ को सबल प्रमाणोँ के आधार पर उन्होँने खण्डित किया है। निष्कर्ष रूप मेँ जहाँ द्विवेदीजी ने परम्परा पर बल दिया है, वहाँ आचार्य शुक्ल ने युग-स्थिति पर, अत: दोनोँ विद्वानोँ के मत परस्पर पूरक हैँ।

आचार्य द्विवेदी के साथ-साथ ही इस क्षेत्र मेँ डा० रामकुमार वर्मा अवतरित हुए। इनका "हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास" सन १९३८ ई. मेँ प्रकाशित हुआ। इस ग्रन्थ मेँ सँ० ७५० से १७५० विक्रमी तक की कालावधि को ही ग्रहण किया गया है। डा० वर्मा ने इतिहास को सात वर्गोँ मेँ विभक्त किया है। उन्होँने स्वयँभू को हिन्दी का पहला कवि मानते हुए हिन्दी साहित्य का आरम्भ सँ० ७५० विक्रमी से स्वीकार किया है। काल-विभाजन एवँ नामकरण करने मेँ आचार्य शुक्ल का अनुसरण किँचित परिवर्तन के साथ किया है। अनेक कवियोँ के काव्य-सौन्दर्य का आख्यान करते समय डा० वर्मा की लेखनी काव्यमय हो उठी है। शैली की सरसता एवँ प्रवाहात्मकता के कारण इनका इतिहास लोकप्रिय हुआ है।

सन १९३५ मेँ डा० गणपतिचन्द्र गुप्त ने "हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास" लिखा। डा० सुमनराजे इन्हेँ साहित्य मेँ वैज्ञानिक पद्धति का अनुसँधाता एवँ प्रयोक्ता मानती हैँ। डा० गुप्त ने हिन्दी के प्रथम कवि के रूप मेँ "भरतेश्वर बाहुबली" के रचयिता शालिभद्र सूरि को मान्यता दी है। वे बीसलदेव रासो, पृथ्वीराज रासो आदि को १३५० ई. के पूर्व की रचना मानते हुए भी विकास-क्रम मेँ मध्यकाल की निश्चित सीमा स्वीकार करते हैँ। जिससे इसमेँ चरितकाव्योँ का निर्णय, सूफी काव्य परम्परा और नाथपँथ का समुचित विवेचन नहीँ हुआ है। स्वातँत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य को सही पृष्ठभूमि नहीँ उपलब्ध हो पायी है।

डा० रामखेलावन पाण्डेय ने "हिन्दी साहित्य का नया इतिहास" नामक ग्रन्थ लिखा। इनका साहित्येतिहास सम्बन्धी विचार नवीन तथा कलात्मक है। इनका कहना है कि उन अंतरँग वृत्तियोँ और स्थितियोँ का अन्वेषण करना होगा, जिनके माध्यम से निर्दिष्टि अवधि की अँतरंग साँस्कृतिक चेतना और साहित्य-बोध की निर्दिष्टता की जा सके।

अन्य परवर्ती इतिहासकारोँ ने कुछ ऎसे शोध प्रबन्ध व समीक्षापरक ग्रन्थ लिखे जो हिन्दी साहित्य के इतिहास की आँशिक रूप मेँ नूतन व्याख्या प्रस्तुत करते हैँ। डा० मोतीलाल मेनारिया कृत "राजस्थानी भाषा और साहित्य", डा० वासुदेवसिँह कृत "हिन्दी साहित्य का उदभवकाल", परशुराम चतुर्वेदी कृत "उत्तरी भारत की सँत परम्परा", डा० विजयेन्द्र स्नातक का "राधावल्ल्भ सम्प्रदाय और उसका साहित्य", पँ० विश्वनाथप्रसाद मिश्र का "हिन्दी साहित्य का अतीत", श्री चन्द्रकाँत बाली का "पँजाब-प्रांतीय हिन्दी साहित्य का इतिहास", डा० टीकमसिँह तोमर का "हिन्दी वीरकाव्य", डा० केसरी नारायण शुक्ल, डा० श्री कृष्णलाल, डा० लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय एवँ भोलानाथ तिवारी के आधुनिक काल सम्बन्धी विभिन्न शोध-प्रबन्ध, डा० सियाराम तिवारी का "मध्यकालीन खण्डकाव्य", डा० इन्द्रपालसिँह का "रीति कालीन प्रबन्ध काव्य", डा० सरला शुक्ल और डा० हरिकान्त श्रीवास्तव आदि के प्रेमाख्यान सम्बन्धी शोध प्रबन्ध आदि महत्वपूर्ण हैँ।

कालविशेष के इतिहास-लेखन की परम्परा मेँ डा० बच्चनसिँह ने "आधुनिक साहित्य का इतिहास" लिखा है। कुछ विद्वानोँ ने साहित्येतिहास के सैद्धान्तिक एवँ व्यवहारिक पक्षोँ तथा उसके विभिन्न काल-खण्डोँ की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालने उद्देश्य से अनेक नूतन प्रयास किये हैँ, जिनमेँ डा० सुमनराजे की "साहित्येतिहास: सँरचना और स्वरूप", डा० राममूर्ति त्रिपाठी की "आदिकालीन हिन्दी साहित्य की साँस्कृतिक पृष्ठभूमि", डा० शिव कुमार मिश्र की "हिन्दी साहित्येतिहास के सिद्धान्त", डाओ शम्भूनाथसिँह की "हिन्दी साहित्य की सामाजिक पृष्ठभूमि" आदि कृतियाँ विशेषत: उल्लेखनीय हैँ।

इस प्रकार ज्योँ-ज्योँ साहित्य-लेखन की परम्परा आगे बढ़ती जाती है तथा साहित्यानुसँधान के क्षेत्र मेँ नये-नये तथ्योँ का उदघाटन होता जा रहा है, त्योँ-त्योँ साहित्येतिहासकार का कार्य भी गुरुतर होता जा रहा है। हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन की परम्परा सर्वथा नवीन ऎतिहासिक दृष्टि को खोजती और प्राप्त करती हुई नव-तत्व विवेचन की ओर अप्रतिहत रूप से अग्रसर है। नित्य नवीनता की उपलब्धि एवँ उसका वैज्ञानिक आकलन ही साहित्यकार का विशिष्ट दायित्व है।