है जाना पहचाना-सा वो शीशा
लगे है क्यों अजनबी-सा चहरा
ख़ुशी की किरणें भी छू न पाईं
उदासियों का घना अंधेरा
ये सोच की डालियों के पंछी
उड़े जो बेपर हआ अचंभा
न शम्अ जलती न ये पतिंगे
न होता जलना न ये जलाना
अमीर ग़ुरबत को जब ख़रीदे
तो कस्रे-ईमां है डगमगाता
गुनाह करके सज़ा न पाये
कि जिसने अपना ज़मीर बेचा