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है जाना पहचाना-सा वो शीशा / देवी नांगरानी

है जाना पहचाना-सा वो शीशा
लगे है क्यों अजनबी-सा चहरा

ख़ुशी की किरणें भी छू न पाईं
उदासियों का घना अंधेरा

ये सोच की डालियों के पंछी
उड़े जो बेपर हआ अचंभा

न शम्अ जलती न ये पतिंगे
न होता जलना न ये जलाना

अमीर ग़ुरबत को जब ख़रीदे
तो कस्रे-ईमां है डगमगाता

गुनाह करके सज़ा न पाये
कि जिसने अपना ज़मीर बेचा