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.. कि जीवन ठहर न जाए / माया मृग

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..... कि जीवन ठहर न जाए
आओं कुछ करें
शहर के बाहर
उस मोडे के डेरे में
छुपकर बेरियां झड़कायें
और बटोरें खट्टे-मिट्ठे बेर।
चलो न आज
रेल की पटरी पर
‘दस्सी’ रखकर
गाड़ी का इंतजार करें
कितनी बड़ी हो जाती है दस्सी
गाड़ी के नीचे आकर !

चलो तो-
झोली में भर लें
छोटे-बड़े कंकर और ठीकरियां,
चुंगी के पास वाले जोहड़े में
ठीकरियों से पानी में थालियां बनायें
छोटी-बड़ी थालियां।
थालियों में भर-भर सिंघाड़े निकालें।
छप्-छप् पैर चलाकर
जोहड़ में ‘अन्दर-बाहर’ खेलें।

या कि
गत्ते से काटें बड़े-बड़े सींग
काली स्याही में रगंकर
सींग लगाकर
उस मोटू को डरायें।
कैसे फुदकता है मोटू-सींग देखकर।

कितना कुछ पड़ा है करने को।
अखबारों से फोटूएं काट-काटकर
बड़े सारे गत्ते पर चिपकाना
धागे को स्याही में डुबोकर
कॉपी में ‘फस्स’ से चलाना
और उकेरना
पंख, तितली या बिल्ली का मुँह !

चोर सिपाही, ‘पोषम पा भई पोषम पा’ खेलें
कितने दिन गुज़र गये।
चलो ना-कुछ करें
कहीं से भी सही-शुरू तो करें
....... कि जीवन ठहर ना जाये
चलो कुछ करें।