भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

11 / हीर / वारिस शाह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तकदीर सेती मौजू फौत होया[1] भाई रांझे दे नाल खहेड़दे ने
खाये रज के घूरदा फिरे रन्ना कढ रिकता[2] धीदो नूं छेड़दे ने
नित सजरा[3] घाव कलेजड़े दागलां त्रिखियां नाल उचेड़दे ने
भाई भाबीयां वैर दीयां करन गलां एहो झिंजटां नित नबेड़दे ने

शब्दार्थ
  1. चल बसा
  2. मखौल
  3. ताज़ा