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128 / हीर / वारिस शाह

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अम्मां चाक बेले असीं पींघ झूटां कहे गैब दे तोतने बोलनी एं
गंदा बहुत मलूक मुंह झूठड़े दा ऐडा झूठ दहाड़ क्यों तोलनी एं
शोलह नाल गुलाब दे त्यार कीता विच पयाज क्यों झूठ दा घोलनी एं
गदों किसे दी नहीं चुरा आंदी दानी होइके गैब[1] क्यों तोलनी एं
अन सुणदियां नूं चा सुणाया ई मोए नाग वांगूं विस घोलनी एं
वारस शाह गुनाह की असां कीता ऐडे गैब दे कूड़ क्यों फोलनी एं

शब्दार्थ
  1. अदृश्य