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140 / हीर / वारिस शाह

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कैदो लथड़ी तफड़ी खून वंिदे कूक बाहुड़ी ते फरयाद मियां
मैंनूं मारके हीर खबार कीता पैंचो पिंड दयो देहो खां दाद मियां
कफनी पाड़ बादशाह दे जा दसां मैं तां पटसुटां बुनयाद मियां
मैं बोलनों न रिहा सच पिछे झगी कूक कीता बे आबाद मियां
चो झगड़िये चल के नाल चूचक एह गल न जाये बरब्बाद मियां
वारस शाह अहमकां[1] नूं बिना फट खाधे नहीं आंवदा इशक स्वाद मियां

शब्दार्थ
  1. बेअकल