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156 / हीर / वारिस शाह

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जदों रांझना जाए के चाक बनया मझी सांभियां चूचक सयाल दीयां ने
खबरां तखत हजारे विच जा पुजिआं कूमां[1] उस अगे बड़े माल दीयां ने
भाइयां रांझे दयां सयालां नूं खत लिखया जातां महरम जात देहाल दीयां ने
मौजू चौधरीदा पुत चाक लायो एह नूं कुदरतां जल जलाल[2] दीयां ने
साथों रूस आया तुसीं मोड़ घलो ऊहनूं बाहरां रात दिन भाल दीयां ने
जिस भूई तों रूसके एह आया क्यारियां बनियां पइयां इस लाल दीयां ने
साथों वाहियां बीजीयां लये दाने अते महानियां[3] पिछले सास दीयां ने
महीं चार के वढयो नकसाडा साथों खूहनियां एसदे माल दीयां ने
मही कटक नूं देके खिसक जासी साडा नहीं जुमा फिरो भाल दीयां ने
एह सूरतां ठग जो वेखदे हो वारस शाह फकीर दे नाल दीयां ने

शब्दार्थ
  1. अनगिनत
  2. कुदरत का खेल
  3. वजन की एक इकाई