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160 / हीर / वारिस शाह

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रांझे दीयां भरजाइयां तंग होके खत हीर सयाल नूं लिखया ए
साथों छैल वधीक सौ वार सुटी लोक यारियां किधरों सिखया ए
देवर चंद साडा साथों रूस आया बोल बोल के घरां थीं त्रिखया ए
साडा लाल मोड़ो सानूं पायो जानो कमलियां नूं पाई भिखया ए
कुड़े सांभ नाहीं माल रांझयां दा कर सारदा दीदड़ा तिखया ए
झट कीतियां लाल न हथ आवण सोई मिले जो तोड़ दा लिखया ए
कोई ढूंढ़ वडेरड़ा कम जोगाअजे एह ना यारियां सिखया ए
वारस शाह लै चिठियां दौड़या ई कम्म कासदां[1] दे मियां सिखया ए

शब्दार्थ
  1. खत ले जाने वाले