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162 / हीर / वारिस शाह

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भाइयां भाबियां चा जवाब दिता मैंनूं वतनथीं चा त्राहयो जे
भूएं खोह के बाप दा लया विरसा मैंनूं अपने गलों चा लाहयो जे
मैंनूं मार के बोलियां भाबियां ने कोई सच दा कौल निभायो जे
मैंनूं दे जवाब चा कढयो जे हल जोड़ क्यारड़ा वाहयो जे
रत्न रन्न खसमां मैंनूं ठिठ कीता मेरे अरश दा किंगरा[1] ढाहयो जे
नित बोलियां मारदियां जाह सयालों मेरा कढना देश थीं चाहयो जे
असीं हीर सयाल दे चाक लगे जटी मेहर दे नाल दिल फाहयो[2] जे
हुण चिठियां लिख के घलियां जे जदों खेतरी दा राखा चाहयो जे
वारस शाह समझा जटेटियां नूं साडे नाल केहा मथा डाहयो जे

शब्दार्थ
  1. किनारा
  2. फँसाया