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168 / हीर / वारिस शाह

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तुसीं एसदे खयाल ना पवो अड़ियो नहीं खटी कुझ एस सपार उतों
नी मैं जीउंदी एस बिन रहां कीकूं घोल घोल घती रांझे यार उतों
झलां बेलयां विच एह फिर भौंदा सिर वेचदा मैं गुनाहगार उतों
मेरे वासते कार कमांवदा ए मेरी जिंद घाती एहदी कार उतों
तदों भाबियां साक ना बणदियां सन जदों सुटया पकड़ पहाड़ उतों
घरों भाइयां चा जवाब दिता एहना भूई दीआं पतियां चार उतों
ना उमैद हो के वतन छड तुरया मोती तुरे जिउं पट दी तार उतों
बिना मेहनतां मसकले[1] लख फेरो नहीं मोरचा[2] जाए तलवार उतों
एह मेहणा लहेगा कदी नाहीं एस सियालां दे सभ प्रवार उतों
नढी आखसन झगड़दी नाल लोकां एस सोहणे भंबड़े[3] यार उतों
वारस शाह समझा तूं भाइयां नूं हुण मुड़े ना ला लख हजार उतों

शब्दार्थ
  1. रेगमाल जैसा कागज
  2. जंग
  3. अनोखे