भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

175 / हीर / वारिस शाह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हीर आखया रांझया कहर होया एथों उठ के चल जे चलना ई
दोवें उठ के लंबड़े राह[1] पईए कोई असां ने देस ना मलना ई
जदों झुगड़े वड़ी मैं खेड़यां दे किसे असां नूं मोड़ ना घलना ई
मां बाप ने जदों वयाह दिती कोई असंा दा जोर ना चलना ई
असीं इशक दे आन मैदान रूझे[2] बुरा सूरमे नूं रनों भजना ई
वारस शाह दे इशक फिराक दौड़े एह कटक फिर आख किस झलना ई

शब्दार्थ
  1. दूर विदेश की राह
  2. व्यस्त होना