भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

177 / हीर / वारिस शाह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

चूचक सयाल नेकौल विसार दिते जदों हीर नूं पाया माइयां नी
कुड़ियां झंग सयाल दीयां धुन्बला हो सभे पास रंझेटेदे आइयां नी
उथे वयाह दे सब समान होए गंढी फेरियां देस ते नाइयां नी
ओए मूरखा पुझ तू नढड़ी नू मेरे नाल तू केहीया चाइयां नी
हुन तेरी रझेटया गल कीकूं तूं हीं रात दिन महीं चराइयां नी

शब्दार्थ