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179 / हीर / वारिस शाह

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रांझे आखया मूंहों की बोलना ए घुट वट के दुखड़ा पीवना ई
मेरे सबर दी दाद जे रब्ब दिती खेड़े हीर सयाल ना जीवना ई
सबर दिलां दे मार जहान पटन उच्ची कासनूं असां बकीवना ई
तुसीं कमलियां इशक थीं नहीं वाकफ नेहुं लावणा निंम दा पीवना ई
वारस शाह जे चुप थीं दाद पाईए उची बोलयां वहीं विहीवना[1]

शब्दार्थ
  1. गुजारा नहीं