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197 / हीर / वारिस शाह

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काज़ी सदया पढ़न नकाह नूं जी हीर वेहर बैठी नहीं बोलदी ए
मैं तां मग रंझेटे दी हो चुकी मां कुफर दे गैब कयों लोलदी ए
निज़ाह[1] वकत शैतान जे दे पानी पई जान गरीब दी डोलदी ए
असां मंग दरगाह थीं लया रांझा सिदक सच जबान पहे बोलदी ए
असंा जान रंझेटे दे पेश कीतो लख खेड़यां नूं चा घोलदी ए
मखन नजर रंझेटे दी असां कीती सुंजी मां कयों छाह नूं रोलदी ए
अंने मेउ[2] वांगू वारस शाह मियां पई मूत विच मछियां टोलदी ए

शब्दार्थ
  1. मौत
  2. मल्लाह