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1984 की लपटें... / रजनी तिलक

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सिक्ख समाज के साथ
जो हुआ
वह देखकर मन तड़प उठा
आँखों में अभी तक अजीब बेचैनी है
रुक-रुक मुट्ठी भिंचती है
वे नृशंस दृश्य सताते हैं
हर क्षण आँखों में उभरते हैं !

उस दिन
क्या गुज़री दिल्ली में,
कैसे सुनाऊँ ?

रात अभी कुछ शुरू होने को थी
’आई’ की लाश अभी ताज़ा थी
दीये भी जलने को आतुर थे
अँगीठी-चूल्हे गर्माने को थे ।

एक बवण्डर आया ज़ोरों से
यह कोई प्राकृतिक आँधी-तूफ़ान न था
बल्कि झुण्ड के झुण्ड दरिया से उमड़ते
कहते हैं लोग जिन्हें इनसान थे ।

कब लाठी चली, कब तीली घिसी
क्षण भर में
दिखीं सिर्फ़ होलिका-सी लपटें
और धू-धू करता धुआँ उठा !
लपटों और धुएँ में
करुण दारुण चीत्कारें उठीं
बिलखते बच्चे, जीवनदान माँगती औरतें
फूट-फूटकर रोते सिक्ख भाई  !

यह कैसी थी आई आँधी
जिसने उखाड़ दिया मन-मानस को  !
पीर वह कैसे हुई बेगानी ?

देश, संस्कृति, राष्ट्रीय एकता का नारा
अपने ही घर में हम हुए बेगाने
गुण्डों के सामने बेबस ।