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19 / हीर / वारिस शाह

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मुंह बुा दिसंदड़ा भाबीए नी सड़े होई फकीर क्यों साड़नी एं
तेरे गोचरा कम की पिया मेरा सानूं बोलियां नाल क्यों मारनी एं
कोठे चाढ़ के पौड़ियां खिच लैंदी केहे कलहां[1] दे महल उसारनी एं
वारिस शाह दे नाल की पिआ तैंनू पर पेकयां वलों गवारनी एं

शब्दार्थ
  1. कलह, लड़ाई