भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

22 / हीर / वारिस शाह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

भुल गए हां वड़े हां आन वेहड़े सानूं बखश लै डारीए वासता ई
हत्थों तेरिओं देस मैं छड जासां वस्सीं देस हैंसियारीए[1] वासता ई
दिन रात तूं जुलम ते लक्क बधा मुड़ीं रूप शिंगारीए वासता ई
नाल हसन दे फिरे गुमान लदी समझ मसत हंकारीए वासता ई
वारस शाह नूं मार ना भाग भरीए अनी मुणस दी पयारीए वासता ई

शब्दार्थ
  1. कातिल