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248 / हीर / वारिस शाह

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महांदेव थीं जोग दा पंथ बनया खरी कठन है जोग मुहिंम मियां
कौड़ा बक बका सवाद है जोग संदा जेही घोटके पीवनी निंम मियां
जहां सुन समाध दी मंडली है तहां जोड़ना है निंम झिंम मियां
तहां भसम लगाइके भसम होणा पेश जाए नाहीं गबर ते डिंम[1] मियां

शब्दार्थ
  1. पाखंड