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253 / हीर / वारिस शाह

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जोग करन सो मरन थीं होए असथिर जोग सिखीए सिखना आया ई
निहचा धार के गुरु दे सेव करिये एह भी जोगियां दा फरमाया ई
नाल सिदक यकीन दे बन्न तकवा धन्ने पथरों रब्ब नूं पाया ई
मैल दिल दी धो के साफ कीती तुरत गुरु ने रब्ब मिलाया ई
बचा सुनो इस विच कलबूत खाकी सचे रब्ब ने थां बनाया ई
वारस शाह मियां हमाओसत[1] जापे सरब्ब मय भगवान नूं पाया ई

शब्दार्थ
  1. रब्ब ही रब्ब