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258 / हीर / वारिस शाह

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संझा[1] लोक बखील ते बाब मंदी मेरा रब्ब बखील ना लोड़ीए जी
कीजे गौर ते कम्म बना दीजे मिले दिलां नूं नांह विछोड़ीए जी
एह हुकम ते हुसन ना नित रैंहदे नाल आजजां करो ना जोरीए जी
जो कोई कम्म गरीब दा करे जाया सगों उसनूं हटकिये होड़ीए जी
बेड़ा लदया होया मुसाफरां दा पार लाईए विच ना बोड़ीए जी
जिमी नाल ना मारिये मूल ओहनां हथीं जिनां नूं चाढ़िये घोड़ीए जी
भला करंदयां ढिल ना मूल करिये किसा दूर दराज ना टोरीए जी

शब्दार्थ
  1. सूना