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263 / हीर / वारिस शाह

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देवां सिखिया[1] रब्ब दी याद दसी गुरु जोग दे भेत नूं पाईए जी
नहा धो के चा भबूत मलीए अते किस वत अंग वटाईए जी
सिंगी फौड़ही खपरी हथ लै के पहले रब्ब दा नाम धयाईए जी
नगर अलख वजाइके जा वड़ीए पाप जान जे नाद बजाईए जी
सुखी दवार वसे जोगी भीख मांगे देई दुआ असीस सुनाईए जी
इस भांत दे नगर दी भीख लै के मसत लटकदे दुआर को आईए जी
वडी माउं ही जान के करो निसख छोटी भैन मिसाल बनाईए जी
वारस शाह यकीन दी गल चगी सभो हक दी हक ठहराईए जी

शब्दार्थ
  1. दीक्षा