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264 / हीर / वारिस शाह

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रांझे आखया मगर ना पौ मेरे कदी कैहर दी वाओ हटाईए जी
गुरु मत तेरी सानूं ना फबे गल घुट के चा लंघाईए जी
पहले चेलयां नूं चाए हीज[1] करीए पिछों जोग दी रीत बताईए जी
इक वार जो सना दस छडो घड़ी मुड़ी ना गुरु अकाईए जी
करतूत जे एहो सी सभ तेरी मुंडे ठग के लीक ना लाईए जी
वारस शाह शागिरद ने चेलड़े नूं काई भली ही मत सिखाईए जी

शब्दार्थ
  1. मनाना