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268 / हीर / वारिस शाह

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नाथा जिऊंदयां मरन है खरा औखा साथों ऐडे ना वायदे होवने ने
असी जट नाड़ीयां[1] करन वाले असां कचकड़े नांह परोवने ने
अखीं कन्न पड़ाय के खवार होए सारी उमर दे दुख दुखोवने ने
साथों खपरी[2] नाद[3] ना जाए सांभे असां अंत नूं ढगड़े जोवने ने
रन्नां नालों जो वरजदे चेलयां नूं एह गुरु ना बन्न के दोवने ने
रन्नां देन गाली असीं चुप करीए एडे सबर दे पैर किस धोवने ने
हस खेडना तुसां चा मने कीता असां धुप दे गोहे ना ढोवने ने
वारस शाह कहे अंत आखरत नूं कटे जावने ने मटे घोवने ने

शब्दार्थ
  1. रस्से
  2. खोपड़ी
  3. शंख