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506 / हीर / वारिस शाह

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सहतीं हीर दे नाल पका मसलत बड़ा मकर फैलायके बोल दी ए
गरदानदी मकरां मुतवलां<ref>लंबे-लंबे</ref> नूं अते कनज़<ref>भंडार</ref> फरेब दी खोल दी ए
इबलीस<ref>शैतान</ref> मलफूफ<ref>लपेटा हुआ</ref> खनाम विचों लै रवायतां जायजां बोल दी ए
अफाकुल हदिस<ref>रसूल की साखी</ref> मनसूख कीती किताब लाईन अला वाली फोलदी ए
तेरे यार फिकर दिन रात मैंनूं जान मापयां तो पई डोलदी ए
वारस शाह सहती अगे मां बुढी वडे गजब दे कीरने फोलदी ए

शब्दार्थ
<references/>