प्रिय पुत्री / ऋचा जैन

अगर देखना ही चाहोगी मेरे पदचिन्ह, मेरी बेटी,
तो देखना उनमें ध्यान से
आँखें भी हैं
और अबके ढूँढना मत टेलिस्कोप से किसी ध्रुव तारे को
बल्कि देखना घास पर लेटकर मुक्त आँखों से
जगह फेरते अनाम तारे और उनकी कम-ज़्यादा होती टिमटिमाहट
अगर देखना ही चाहोगी मेरे पदचिन्ह तो सुनना
ध्यान से
उनमें कान भी हैँ
और अबके छोड़ देना गंतव्य को
और सुनना सारी बातें यायावरी की
 
जो देखना ही चाहोगी मेरे पदचिन्ह तो सूँघना
ध्यान से
कुछ गंध भी होंगीं उनमें
गहरे खींचना और पहचानना
हवा, पानी, हँसी और स्वछंदता
जो देखना ही चाहोगी मेरे पदचिन्ह तो देखना
मत
कि कहाँ तक, किस राह, कितने सुडौल या कितने बड़े
वरन देखना, कहाँ ठिठक हो गए थे खड़े
किन दरवाजों को रहे तकते

वहाँ, बस वहाँ रुक जाना।
और अबके न करना अनसुना हृदह के भीतरी कमरों से आते उन मद्धम आभासों को
खटखटाना उन दरवाज़ों को
 
जो देखना ही चाहोगी, मेरी बेटी, मेरे पदचिन्ह
तो देखना, सुनना, सूँघना, समझना,
और चिन्हित करना नये
स्वयं के

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