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|रचनाकार=कुमार रवींद्र |संग्रह=लौटा दो पगडंडियाँ / कुमार रवीन्द्र
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बक्सों में बन्द हैं यादें
धोबी ने धोते समय इनको रगडा़ था
पीटा था
मैल कट गया पर ये न कटींयह और अन्दर चलीं गईंहम ने निर्मम होकर इन्हें उतार दियाइन्होंने कुछ नहीं कहापर हर बारये हमारा कुछ अंश ले गईंजिसे हम जान न सकेत्वचा से इनका जो सम्बन्ध है वह रक्त तक हैरक्त का सारा उबाल इन्होंने सहा हैइन्हें खोलकर देखोइन में हमारे ख़ून की ख़ुशबू ज़रूर होगीअभी ये मौन हैंपर इन की एक एक परत में जो मन छिपा हैवह हमारे जाने के बाद बोलेगायादें आदमी के बीत जाने के बाद ही बोलती हैंबक्सों में बन्द रहने दो इन्हेंजब पूरी फ़ुर्सत हो तब देखनाइन का वार्तालाप बडा़ ईष्यालु हैकुछ और नहीं करने देगा
</poem>
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