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यादों की राहगुज़र / अविनाश

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नीलकंठ काली कोयल की कूक गुलाब महकता है
सुबह दोपहर षाम शाम सेठ के आगे पीछे करते हैं
बेशर्मी से भरा हुआ श्रम बन कर घाव टभकता है
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