"परिवर्तन / अंतराल / महेन्द्र भटनागर" के अवतरणों में अंतर
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जग के उर में किसने डाली आज नये फूलों की माला, | जग के उर में किसने डाली आज नये फूलों की माला, | ||
− | खाली प्याली में किसने रे भर-भर कर छलका दी हाला ! | + | खाली प्याली में किसने रे भर-भर कर छलका दी हाला! |
सूखे तरु-तरु, पल्लव-पल्लव में फिर से आयी अरुणाई, | सूखे तरु-तरु, पल्लव-पल्लव में फिर से आयी अरुणाई, | ||
− | कण-कण झूम उठा चंचल हो, चमक दिशाएँ भी मुसकाईं ! | + | कण-कण झूम उठा चंचल हो, चमक दिशाएँ भी मुसकाईं! |
है बनी सुहागिन धरा-वधू जिसके अंग-अंग में शुचिता, | है बनी सुहागिन धरा-वधू जिसके अंग-अंग में शुचिता, | ||
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झूम रही है जगती सारी उमड़ी सरिता-सी दीवानी, | झूम रही है जगती सारी उमड़ी सरिता-सी दीवानी, | ||
− | खेल रहा है मानों टकरा पथ के पाषाणों से पानी ! | + | खेल रहा है मानों टकरा पथ के पाषाणों से पानी! |
जग का उपवन स्वर्ण अलंकृत, बीती बोझिल युग-रात घनी, | जग का उपवन स्वर्ण अलंकृत, बीती बोझिल युग-रात घनी, | ||
− | नभ के परदे पर यौवन की नव लाली उतरी स्नेह-सनी ! | + | नभ के परदे पर यौवन की नव लाली उतरी स्नेह-सनी! |
नव-संसृति में आया जीवन, अणु-अणु में है कंपन सिहरन, | नव-संसृति में आया जीवन, अणु-अणु में है कंपन सिहरन, | ||
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गुंजित नभ-भू आँगन, होता चिड़ियों का मीठा कलरव, | गुंजित नभ-भू आँगन, होता चिड़ियों का मीठा कलरव, | ||
परिवर्तन की मधु बेला में सबने रूप धरा है नव-नव ! | परिवर्तन की मधु बेला में सबने रूप धरा है नव-नव ! | ||
− | 1947 | + | |
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15:17, 29 दिसम्बर 2009 के समय का अवतरण
जग के उर में किसने डाली आज नये फूलों की माला,
खाली प्याली में किसने रे भर-भर कर छलका दी हाला!
सूखे तरु-तरु, पल्लव-पल्लव में फिर से आयी अरुणाई,
कण-कण झूम उठा चंचल हो, चमक दिशाएँ भी मुसकाईं!
है बनी सुहागिन धरा-वधू जिसके अंग-अंग में शुचिता,
कोमल नव-पंखुरि-सी सुन्दर मनहर शीतल जिसकी मृदुता!
झूम रही है जगती सारी उमड़ी सरिता-सी दीवानी,
खेल रहा है मानों टकरा पथ के पाषाणों से पानी!
जग का उपवन स्वर्ण अलंकृत, बीती बोझिल युग-रात घनी,
नभ के परदे पर यौवन की नव लाली उतरी स्नेह-सनी!
नव-संसृति में आया जीवन, अणु-अणु में है कंपन सिहरन,
चंचल लहरों से डोल उठा जगती-सरि का सोया तन-मन!
गुंजित नभ-भू आँगन, होता चिड़ियों का मीठा कलरव,
परिवर्तन की मधु बेला में सबने रूप धरा है नव-नव !
रचनाकाल: 1947