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"मैं और बज़्मे-मै से / ग़ालिब" के अवतरणों में अंतर
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09:37, 27 फ़रवरी 2010 का अवतरण
मैं और बज़्मे-मै<ref>शराब की महफ़िल</ref> से यूं तश्नाकाम<ref>प्यासा</ref> आऊं!
गर मैंने की थी तौबा साक़ी को क्या हुआ था?
है एक तीर जिसमें दोनों छिदे पड़ें हैं
वो दिन गए कि अपने दिल से जिगर जुदा था
दरमान्दगी<ref>दुख</ref> में 'ग़ालिब' कुछ बन पड़े तो जानूं
जब रिश्ता बेगिरह था नाख़ून गिरह-कुशा<ref>गांठ खोलनेवाला</ref> था
शब्दार्थ
<references/>