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"विधान / अजित कुमार" के अवतरणों में अंतर

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प्यास तो ऐसी लगी थी-
 
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क्या समन्दर,क्या सितारे  
 
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सभी को पी लूँ ,
 
सभी को पी लूँ ,
 
 
कामना ऐसी जगी थी-
 
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क्या हमारे, क्या तुम्हारे,
 
क्या हमारे, क्या तुम्हारे,
 
 
सभी क्षण जी लूँ
 
सभी क्षण जी लूँ
 
 
किन्तु विधि के उन निषेधों,
 
किन्तु विधि के उन निषेधों,
 
 
उन विरोधों को कहूँ क्या-
 
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जो विवश करते :
 
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प्रीति जो मन में रंगी थी-
 
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तोड़ डालूँ बिन-विचारे,
 
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होंठ को सी लूँ ।
 
होंठ को सी लूँ ।
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19:50, 1 नवम्बर 2009 के समय का अवतरण

प्यास तो ऐसी लगी थी-
क्या समन्दर,क्या सितारे
सभी को पी लूँ ,
कामना ऐसी जगी थी-
क्या हमारे, क्या तुम्हारे,
सभी क्षण जी लूँ
किन्तु विधि के उन निषेधों,
उन विरोधों को कहूँ क्या-
जो विवश करते :
प्रीति जो मन में रंगी थी-
तोड़ डालूँ बिन-विचारे,
होंठ को सी लूँ ।