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"चराग़े-दिल / देवी नांगरानी" के अवतरणों में अंतर
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+ | छीन ली मुझसे मौसम ने आज़ादियाँ | ||
+ | चराग़ों ने अपने ही घर को जलाया | ||
+ | सिसकियों में हों पल रहे जैसे | ||
+ | तुझको अपना खुदा बनाया है |
19:15, 18 जून 2008 का अवतरण
चराग़े-दिल
रचनाकार | देवी नांगरानी |
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प्रकाशक | |
वर्ष | |
भाषा | हिन्दी |
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विविध |
इस पन्ने पर दी गई रचनाओं को विश्व भर के स्वयंसेवी योगदानकर्ताओं ने भिन्न-भिन्न स्रोतों का प्रयोग कर कविता कोश में संकलित किया है। ऊपर दी गई प्रकाशक संबंधी जानकारी छपी हुई पुस्तक खरीदने हेतु आपकी सहायता के लिये दी गई है।
- कितने पिये है दर्द के / देवी नांगरानी
- दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था / देवी नांगरानी
- देखकर मौसमों का असर रो दिए / देवी नांगरानी
- सर पटकते हैं आशियानों में / देवी नांगरानी
- आंधियों के भी पर कतरते हैं / देवी नांगरानी
- ताज़गी कुछ नही हवाओं में / देवी नांगरानी
- या बहारों का ही ये मौसम नहीं / देवी नांगरानी
- डर उसे फिर न रात का होगा / देवी नांगरानी
- उड़ गए बालो-पर उड़ानों में / देवी नांगरानी
- आज हम धूप खाने आए हैं / देवी नागरानी
- लबों पर गिले यूं भी आते रहे हैं / देवी नागरानी
- तारों का नूर लेकर ये रात ढल रही ह / देवी नागरानी
- रब्बा, मेरे नसीब में ऐसी बहार दे / देवी नागरानी
- बाकी न तेरी याद की परछाइयां रहीं / देवी नागरानी
- मोती कभी पलकों से गिराए नहीं हमने... / देवी नांगरानी
- झूठ की बस्तियों में रहती हूँ / देवी नागरानी
- झूठ सच के बयान में रक्खा / देवी नागरानी
- कोई और था फिर भी / देवी नागरानी
- गर्दिशों ने बहुत सताया है / देवी नागरानी
दर्द बनकर समा गया दिल में छीन ली मुझसे मौसम ने आज़ादियाँ चराग़ों ने अपने ही घर को जलाया सिसकियों में हों पल रहे जैसे तुझको अपना खुदा बनाया है