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आदिकवि
तुम कवि थे
कवित्त करते रहे
तुम्हारी तरह
बाद के कवि भी
लिखते रहे
अभिज्ञान शाकुंतलम्
तुम डूबे रहे
प्रेम में
भक्ति में
रस में
छन्द में
आमोद में
प्रमोद में
तुम्हारा ध्यान
हाशिये पर बसे
लोगों तक कभी
गया ही नहीं
तुम्हें तो
पता ही नहीं था
वे थे कौन?
तुम्हारी तरह
कवित्त नहीं करते थे, वे
सिर्फ बुनते थे
ताना-बाना
तुम ओढ़ते रहे जिसे
कभी रामनामी
कभी कृष्णनामी
कभी शिवनामी बना।
तुम कवि थे
तथाकथित महान सभ्यता
संस्कृति के वाहक?
जिसमें बुननेवाला
हमेशा की ही तरह नदारत था
भूल कर उन्हें
करते रहे स्तुतिगान
तुम सचमुच कवि थे महान?