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"धुरी / स्वाति मेलकानी" के अवतरणों में अंतर
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17:52, 5 अगस्त 2017 के समय का अवतरण
आर और पार के बीच
युगों से तैरती मैं
रोज देखती हूँ
उगतेढलते सूर्य के साथ
घूमती पृथ्वी को।
गतिमान यथार्थ के परे
चिर जड़त्व से श्रापित धुरी को
आदि से पकड़ा है मैंने।
अब भला क्या अंत होगा
उस हृदय का
जो इसी गतिशीलता में
थम गया है।
यह सतत विस्तार मुझसे ही जुड़ा है
विचर लो तुम...
पर मुझे रहना यहाँ है
मैं तुम्हारी धुरी हूँ... जाना कहाँ है।