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दीवार पर / व्योमेश शुक्ल

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{{KKRachna
|रचनाकार=व्योमेश शुक्ल
}}<poem>
गोल, तिर्यक, बहकी हुईं
सभी संभव दिशाओं और कोणों में जाती हुईं