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दीवार पर / व्योमेश शुक्ल
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20:17, 10 अप्रैल 2009
{{KKRachna
|रचनाकार=व्योमेश शुक्ल
}}
<poem>
गोल, तिर्यक, बहकी हुईं
सभी संभव दिशाओं और कोणों में जाती हुईं
Pratishtha
KKSahayogi,
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