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औकात / राजू सारसर ‘राज’

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चेत सूं लेय ’र
उधार रो हरख
उमायोड़ो खेत
आफर ’र ढोल होया
फाटण ढूक्या
पण भूलग्या,
बैसाखर भचीड़ा लाग्यां,
कांईं बणसी ?
आथूणां रा गोळां सूं
खेत, खेत रह्या
सगळो उमाव
आ फू होग्यौ
अबै पड्या है
मूंथै माथै
औकात भूलणियां
अमर कुण देख्या।