भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

पिता-4 / नरेश चंद्रकर

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 19:14, 5 मई 2009 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=नरेश चंद्रकर |संग्रह=बातचीत की उड़ती धूल में / न...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

दुर्लभ हो सकती हैं कई सारी चीज़ें

किसी दिन के बाद
किसी के न रहने पर

जैसे पिता के ही

चूने और तम्बाखू की गन्ध
धूप में सूखती हुई धोती

रक्तचाप की गोलियों से भरा डिब्बा
पते लिखी हुई पुरानी डायरियाँ

ऎसी अनेक चीज़ें हो सकती हैं दुर्लभ
किसी दिन के बाद!