Last modified on 21 सितम्बर 2008, at 00:16

तुम्हारी खोज में / अजित कुमार

अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 00:16, 21 सितम्बर 2008 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=अजित कुमार |संग्रह=अंकित होने दो / अजित कुमार }} त...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

तमाम लोगों के बीच

मैं तुम्हें खोजता हू।

जाते हुओं में और

आते हुओं में,

हँसते, चुप बैठे, रोते,

गाते हुओं में

केवल तुम्हें खोजता हूँ ।

किन्तु कैसी विवशता है कि

सब में

मैंने

केवल अपने को पाया है ।

भीड़ों में धँसकर

या बाँहों में कसकर,

उठकर या गिरकर,

चलते-चलते रुककर

लोग …

उनकी विवशता थी कि

मेरी ही तरह

वे भी तुम्हें खोजते थे ।

अरे । उन सब में

मैने

तुम्हें नहीं,

बार-बार अपने को पाया है ।