रतन / पद्मजा शर्मा

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बना रहा है कागज के हवाई जहाज़
घर झाड़ते-जाले हटाते-बर्तन माँझते हुए
उड़ा रहा है हवाई जहाज़
और ख़ुद भी उड़ रहा है रतन

रतन चला रहा है खिलौना कार
घर के एक कोने से दूसरे कोने तक
इतनी गति से जाती है उसकी कार
कि हर सदस्य रह जाता है दंग

वह साफ कपड़े पहन रहा है
पौष्टिक खाना खा रहा है
पर उसकी आँखें रहती हैं भरी-भरी

‘माँ की याद आई रतन ?’
पूछने पर नज़रें चुराता है
‘नहीं आंटीजी, कांदे की झाळ लग गई’
कहकर एकटक देखता है मेरी आँखों में
डबडबाई आँखों से रतन

‘रतन तेरे पिता कैसे गुजरे
कितने भाई-बहिन हैं
गांव में खेत
रिष्तेदारी है
कुछ तो बता ?’

‘माँ कैसी है
तुझे अपने से दूर कैसे रख लेती है ?’
‘सब है आंटीजी, बस रूखाळिया नहीं रहा
इसी से रहना पड़ता है’

रतन फोन उठा, रतन दरवाज़ा खोल
रतन यह कर, रतन वह कर
रतन इधर आ, रतन उधर जा

रतन सब जगह है
बस वहीं नहीं है, जहाँ उसे होना चाहिए

‘रतन मेरा भी मन नहीं लगता रे’
सुनकर खिलौना कार चलाते हाथों में
लग जाता है ब्रेक
सूख जाता है उसकी आँखों का पानी
कागजी हवाई जहाज़ हो जाते है धराशायी
अविश्वास से जब देखता है मेरी ओर रतन

‘आंटीजी ! बाबो भली करैला’
हर बार मुझे तसल्ली देता हुआ
तेरह का रतन हो जाता है तीस का

पर मेरे मुड़ते ही खिड़की से बाहर
जाने कहाँ, क्या तो देखने लग जाता है छोटा-सा रतन

‘रतन दिवाली पर गाँव जाये तो
माँ के लिए घाघरा-ओढ़नी ले जाना’
‘हाँ आंटीजी’ कहते हुए
चमक उठती हैं उसकी आँखें
पर रोने को हो आता है अगले ही पल
आँखों की चमक पड़ जाती है धुंधली

‘तू ऐसा क्यों करता है रतन ?’
‘क्या आंटीजी ?’
‘तू ख़ुश नहीं है यहाँ ?’
‘बहूत ख़ुश हूँ आंटीजी !’
उसके होंठ कांप जाते हैं यह कहते हुए
हाथ से छूट जाती है प्लेट
देर तक गूंजती है उसकी झनझनाहट हवा में
घर में, चारों दिशाओं में

‘मैं दिवाली पर गाँव नहीं जाऊँगा आंटीजी’
‘क्यों ?’
‘नहीं देख पाता माँ को उदास
वह हर रोज़ मरती है जीने के लिए
ओढ़ लिया तो बिछाने को नहीं
सवेरे मिल गया तो शाम नहीं’
दिवाली के दिए जलने से पहले ही
बुझ जाते हैं उसकी आँखों में

वह बात का रूख बदलता है
‘आंटीजी ! कुरजां गीत कैसा लगता है,
कैसेट लगा दूँ ?’
और गुनगुनाता है
‘कुरजां ए म्हारो भंवर मिला दीजै ऐ ...’
‘रतन तेरी राग अच्छी है
किस से सीखा ?’
‘माँ से आंटीजी !’
कह कर रो पड़ता है रतन।

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