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जीवन / हरी घास पर क्षण भर / अज्ञेय

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यहीं पर
सब हँसी
सब गान होगा शेष :

यहाँ से
एक जिज्ञासा
अनुत्तर जगेगी अनिमेष!

इलाहाबद, मई, 1949