आकाश स्थिर
और सब अस्थिर मगर आकाश सुस्थिर है । अचिर सब है, शून्य का, पर, भाव यह चिर है । नभ असीम, अपार का वैभव अदृष्ट, अमाप; मनुज है ऊँचा बहुत, पर यहाँ नतशिर है ।
नींद में डूबे योद्धा सुरक्षित हैं
कौंधती उधर किरनें लड़ने को आती हैं ।
हम तो अप्रस्तुत हैं ।
डूबे हैं नींद में, खोए हैं स्वप्न में, चेतन से परे ये हम लीन हैं अचेतन में ।
हम तो अप्रस्तुत हैं, इसलिए सुरक्षित हैं ।
आख़िर हमसे क्या लेगा उजाला ? आख़िर क्या कर लेंगी किरनें हमारा ? उनके पैने-तीखे तीर सभी व्यर्थ हैं । होएँ हम किरणों से भले ही अपरिचित पर ज्ञात है हमें तो—
वे गन्दी हैं, नीच और घृणित और कुत्सित है, रखती अपेक्षा हैं नींद तोड़ने की वे । दंभ-मात्र ही है यह ।
जाओ अनुचरो, अरे निशि के अनुचरो ।
कहो—
नहीं है अप्रस्तुत हम ।
सज्जित हैं, रक्षित हैं, पालित हैं
--सुप्ति के कवच में ।
यह राज्य हमारा है । किरणों के चापों पर ध्यान नहीं देंगे हम
--स्वप्नों के अभयद कुंडलों से अलंकृत हैं । …
कितना ही कहो हमें—‘सूर्यपुत्र । सूर्यपुत्र । उसका पितृत्व यहाँ कौन स्वीकारता । तुम्हीं हो असत्य-पक्ष, तुम्हीं दस्यु, अन्यायी । धर्मयुद्ध को हम धर्मयुद्ध नहीं मानते ।
हम तो हैं वीर कर्ण । वीर कर्ण । --मूर्ख नहीं । दान नहीं देंगे हम । कवच और कुंडल हम कभी नहीं त्यागेंगे— क्या मारे जाएँगे ??
हम हैं कूटज्ञ कर्ण, धूर्त कर्ण, चतुर कर्ण : दानी नहीं । और यों सुरक्षित हैं उसके उजाले से संभव है, जिससे हम कभी कहीं जन्मे हों ।
आभार-स्वीकार
‘दर्द’ तुमने कहा जिसको
और यों दुखती हुई रग जान ली
मैंने अभी तक सहा जिसको ।
उसीको-
हाँ, छिपाने के लिये उसको गीत गाये थे, अधूरे और पूरे गीत गाये थे ।
जान ही जब लिया तुमने शेष और भला बचा क्या । दर्द के अतिरिक्त हमने सहा याकि रचा भला क्या ।
कहीं कुछ भी नहीं : केवल प्यास, केवल आग । धब्बे, चिन्ह, बेबस दाग
यही थे- जिनको बहाने के लिये आँसू छिपाये थे ।
तुम्हींने यह भी कहा था-
‘मिटाने पर मिट न जाये दर्द यह ऐसा नहीं है । शर्त लेकिन एक है- उस दर्द में मत रमो । देखो। पाल खोलो, उठाओ लंगर, चलो- दुखती हुई रग के सदृश यह द्वीप त्यागो ।‘
तुम्हींने हमसे कहा था-
‘अरे, जागो ।‘
और उस कहने तथा खुद भी बहुत सहने के कारन मुक्ति की जब घड़ी आई-
स्वत: बन्दी बना था जिस द्वीप में उससे विलग हो, पाल खोले मुक्त नाविक ने उधर … उस द्वीप को जाती लहर पर
पुष्प अंजलि से बहाये थे ।
आज वह सब व्यक्त है जिसको छिपाने के लिये … छिपा देने के लिये कुल गीत गाये थे । आज सचमुच मुक्त है जिसको बहाने के लिये … बहा देने के लिये आँसू छिपाये थे । आज तो वह त्यक्त है वह दर्द भी : वह द्वीप भी … वही जिस तक पुष्प अंजलि से बहाये थे ।
उजड़े मेले में
कुछ तो वह अजब तमाशा था कुछ हम भी थे ऐसे … रह गये देखते, और जान ही सके नहीं- कब गुज़र गया सब खत्म हुआ कैसे ॥
जब चेत हुआ तो क्या देखा
कुछ बिखरे-बिखराये कागज़ कुछ टूटे-फूटे पात्र पड़े । सारा मेला है उजड़ चुका, बस, एक अकेले हमीं खड़े ।
जिस जगह बड़ा सा घेरा था, केवल कुछ गड्ढे शेष रहे । सुलगती लकड़ियां, राख और मैले पन्ने, उतरे छिलके :
जो यही पूछते-से लगत-
‘रे, कौन यहां पर आया था ? यह किसका रैन-बसेरा था ?
यह उजड़ा मेला
उखड़े हुए नशे जैसा, सारे मोहक आकारों के सौ-सौ टुकड़े । सब आकर्षक ध्वनियां- अब केवल ‘भाँय-भाँय’ । रंगों के बदले-फीके,मटमैले धब्बे ।
वह एक तमाशा था …
लेकिन
उलझी-सुलझी रस्सियां, बांस गांठोंवाले … कुम्हलाये हुए फूल-पत्ते… सारे का सारा आसपास जो दिखता है बेहद उदास : यह भी तो एक तमाशा है ।
उजड़े-बिखरे, टूटे-फूटे की भी तो कोई भाषा है।
कीचड़ से भरी तलैया का गँदला पानी
चुपके-चुपके कहता-सा है— ‘अधजली घास हरियाएगी…
गँदले पानी को थपकी देती हुई हवा कुछ राख उड़ाकर ले जाती , कुछ धूल उड़ाकर ले आती: अब तिरछे-सीधे चरण-चिन्ह, सब गहरे,ठहरे, बड़े चिन्ह धीरे-धीरे मिट जाएँगे । लगने दो मेला और कहीं ।
संक्रमण
चलते थे जिनपर वे सड़कें भी मुड़-तुड़ कर खतम हो गई थी, । सब आवाजें कभी यहाँ, कभी वहाँ –थोड़ी या बहुत देर— बोल : सो गई थीं ।
दोस्त सुबह-शाम, रात-रात भर बातें कर: चुप थे, अब रीते थे । और अधिक मादकता, आकुलता, विह्ललता जगा नहीं पाते थे दिन वे— जो बीते थे।
हर क्षण जो बढती थी वही उम्र कहीं, किसी जगह रुक गई थी, और रात— पहाड़ी पर : कुछ घंटों के खातिर ? नहीं— सदा-सर्वदा के लिए झुक गई थी ।
पेड़ों-पौधों-फूलों का उगना बन्द था ,
पंचम स्वर तक पहुँचा हुआ गीत मन्द था।
बहुत तेज़ गति से बहनेवाली धारा अब वर्षा की नदी-सदृश रेती में खोई थी । फ़सल : कट-कटा कर, सब खतम हो चुकी थी, जो साधों से बोई थी ।
वह ठहरी-ठहरी वय । निर्मम जड़ता की जय । बहरी स्थिरता का भय्।
लहरों-काँटों-चहारदीवारों : अवरोधों-कुंठा-सीमा-भारों : का दुर्जर घेरा था ।
यह था : जो मेरा था । इसीलिए घेरा तोड़ा मैंने, जो ‘मेरा’ था : वह छोड़ा मैंने ।
नई धवलगात रात , नवल ज्योति-स्नात प्रात, जाग्रत जीवन, कलरव, नए जगत, नव अनुभव , भिन्न दृश्य, पथ, चित्रों, स्नेही-निश्छ्ल मित्रों के लिए प्रतीक्षा की । इनसे फिर दीक्षा ली ।
वर्ष नया
कुछ देर अजब पानी बरसा । बिजली तड़पी, कौंधा लपका …
फिर घुटा-घुटा सा, घिरा-घिरा हो गया गगन का उत्तर-पूरब तरफ़ सिरा ।
बादल जब पानी बरसाये तो दिखते हैं जो, वे सारे के सारे दृश्य नज़र आये ।
छप-छप,लप-लप, टिप-टिप, दिप-दिप,- ये भी क्या ध्वनियां होती हैं ॥
सड़कों पर जमा हुए पानी में यहां-वहां बिजली के बल्बों की रोशनियां झांक-झांक सौ-सौ खंडों में टूट-फूटकर रोती हैं।
यह बहुत देर तक हुआ किया …
फिर चुपके से मौसम बदला तब धीरे से सबने देखा-
हर चीज़ धुली, हर बात खुली सी लगती है जैसे ही पानी निकल गया ।
यह जो आया है वर्ष नया-
वह इसी तरह से खुला हुआ , वह इसी तरह का धुला हुआ बनकर छाये सबके मन में , लहराये सबके जीवन में ।
दे सकते हो ? --दो यही दुआ ।