Last modified on 17 अक्टूबर 2013, at 07:32

मिमता / कन्हैया लाल सेठिया

जाणै
कीड़ी‘र
चीड़ी
कठैं है
बीं रो
बिल‘र आलो ?

ढलन्तै सूरज
कर‘र चुगो पाणी
टुर ज्यावै
आप आप रै
ठिकाणैं कानी !

इस्या किस्या
एनाण
सैनाण
जकां रै पाण
राखै ठाई ओलखाण ?

मनैं लागै
ममतालू आंख
कोनी चुकलण दै
जीव रा
पग‘र पांख !