1,457 bytes added,
15:11, 25 जनवरी 2011 {{KKGlobal}}
{{KKRachna
|रचनाकार=चाँद हादियाबादी
}}
{{KKCatGhazal}}
<poem>
तेरी आँखों का यह दर्पण अच्छा लगता है
इसमें चेहरे का अपनापन अच्छा लगता है
तुंद हवाओं तूफ़ानों से जी घबराता है
हल्की बारिश का भीगापन अच्छा लगता है
वैसे तो हर सूरत की ही अपनी सीरत है
हमको तो बस तेरा भोलापन अच्छा लगता है
पहले तो तन्हाई से हमको डर लगता था
अब तो न जाने क्यों सूनापन अच्छा लगता है
हमने इक दूजे को बाँधा प्यार की डोरी से
सच्चे धागों का यह बंधन अच्छा लगता है
बोलें कड़वे बोल न हम कुछ फीका सुन पाएँ
ऐसा ही गूँगा-बहरापन अच्छा लगता है
दाग़ नहीं है माथे पे रहमत का साया है
‘चाँद’ के चेहरे पर ये चंदन अच्छा लगता है</poem>