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आग / रजत कृष्ण
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18:30, 7 अप्रैल 2014
एक ही फूँक से
जो दहक उठती है ।
तब आग की
एक लपट ही बहुत होती है
जब शासक की धमनियों में
पसर जाता है ठण्डापन
जुड़ा जाते हैं विचार ।
</poem>
अनिल जनविजय
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