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|रचनाकार=सरवर आलम राज़ 'सरवर'
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|संग्रह=एक पर्दा जो उठा / सरवर आलम राज़ 'सरवर'
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<poem>दिल ये कहता है तवाफ़-ए-कू-ए-जानाना सही!
शर्त है सज्दा वफ़ा का,सो वो रिन्दाना सही!

जी नही भरता सुने जाते हैं सब शाम-ओ-सहर
ज़िन्दगी टूटे हुए ख़्वाबों का अफ़्साना सही!

रिश्त-ए-उल्फ़त संवर जाना कमाल-ए-इश्क़ है
गोश-ए-मस्जिद नहीं तो बाब-ए-मयख़ाना सही!

पासदारी आप को दुनिया की है गर इस क़दर
आर क्यों है मुझ से मिलने में, हरीफ़ाना सही!

बुझ गई बाद-ए-मुख़ालिफ़ से जो शम्म-ए-अन्जुमन
फिर दलील-ए-राह-ए-मंज़िल ख़ाक-ए-परवाना सही!

इश्क़ मे फ़र्क़-ए-मरातिब?अल-अमान-ओ-अल-हफ़ीज़!
रंग-ए-शाहाना सही, तर्ज़-ए-गदायाना सही!

अस्ल--ए-इमां क्या है?याद-ए-यार है और कुछ नहीं!
मस्जिद-ओ-मिम्बर सही, या कोई बुतख़ाना सही!

‘सरवर’-ए-नाकाम अपने काम में हुशयार है
आप दीवाना समझते हैं तो दीवाना सही!

</poem>
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