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17:48, 22 फ़रवरी 2023 {{KKGlobal}}
{{KKRachna
|रचनाकार=कुमार कृष्ण
|अनुवादक=
|संग्रह=धरती पर अमर बेल / कुमार कृष्ण
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<poem>
बेचैन शब्द जब पहुँचते हैं कविता के घर
शब्द की शक्ल और अक्ल
दोनों बदल देती है कविता
बेचैन शब्द बनाते हैं-
कई दरवाजों, अनेक खिड़कियों वाले मकान
समय से समय का अपहरण करके बेचैन शब्द
छुपा लेते हैं कविता के घर में
बेचैन शब्द सच और साहस के सत्तू लेकर
पहुँचते हैं संवेदना के पास
मिल कर सिलते हैं कविता का कुर्ता
बड़ा होता जाता है बेचैन शब्दों का विश्वास
कविता के घर में रह कर
खुदमुख्तार, खुद्दार, निडर हो जाते हैं शब्द
बेचैन शब्द हर रोज एक नया रोजनामचा
नया रजिस्टर बनाते हैं
बेचैन शब्द पुराना घर तोड़ कर
नया घर बनाने को ज़िंदा रहते हैं।
</poem>